शाकाहारी लोगो को लग रहा भयंकर पाप



 आप भी यह हैडिंग पढ़ कर अवश्य चौक गए होंगे परंतु यह सच है। आज के समय जितने भी लोग दूध या उससे बने अन्य प्रोडक्ट्स खा रहे हैं तो वह आज यह जरूर पढ़ें।

 

क्या आपने कभी विचार किया कि जब से दूध का व्यापार बड़ा है तो इतना दूध कहां से आता है जबकि हमारे आसपास पशुपालन घटा है। यह डायरी फॉर्म की मिल्क प्रोडक्ट की सप्लाई चैन कैसे काम करती होगी आपको दूध जैसी अमूल्य चीज इतनी वाइडऐली और कम प्राइस में कैसे उपलब्ध कराई जाती होगी। जो पशुपालन करते हैं यह प्राइस उनके लिए भी दे पाना मुश्किल है जबकि वह सीधा, बिना पैकेजिंग और ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट के आपको यह दूध देते हैं या उससे जुड़े प्रोडक्ट देते हैं। इसका बड़ा कारण है कसाई खाने।


 आज भारत टॉप 3 देश में गोमांस ऑन रिकॉर्ड एक्सपोर्ट करता है। २.२ बिलियन डॉलर का मार्केट इंडिया से चलता है। जिसके अप्रत्यक्ष कारण यहां की बड़ी आबादी के लोग हैं। हिंदू यानी हिंसा से दूर, मगर क्या यह आज का हिंदुस्तान ऐसा है। आज की स्थिति का एक बड़ा कारण लोगों का केवल अपने में व्यस्त रहना है। आज स्थिति ऐसी है कि लोग जानना ही नहीं चाहते कि दूसरा व्यक्ति क्या करता है, कैसा सामान वह उसे ले रहे हैं और वह क्या इस्तेमाल कर रहे हैं, कहां और कैसे बन कर आया है। इसकी जानकारी वह नहीं लेना चाहते जिसके कारण बाहर के देशों के लिए भारत एक बड़ा कंज्यूमर मार्केट है जिन्हें मार्केटिंग करके वह कुछ भी बेच सकते हैं चाहे वह गुटका या उनके अपने देश में बैन हो चुका सॉस, अन्य दवाइयां इत्यादि। भाव को कम करने के दो ही तरीके हैं या तो प्रकृति को हानि पहुंचा कर बड़ी मात्रा में उसका दोहन करो या अपने ही देश में माल बनाकर जनता के हिसाब से प्रत्येक प्रकृति के संसाधन का इस्तेमाल करें। इम्पोर्ट और मार्केटिंग का खर्च कम करके गुणवत्ता में ध्यान दें। परंतु यह निराशाजनक है कि हम प्रकृति को नुकसान पहुंचाने की मार्ग पर अग्रसर है।


 अब बात करते हैं डेयरी फार्म से सस्ते प्रॉडक्ट की कीमत कौन चुका रहा है? वो है, हमारी प्यारी गौमाता और भैस एवं उनके नन्हे नन्हे बच्चे।जी हाँ। बच्चे के पैदा होते ही तभी उन्हें या तो कसाई को बेच दिया जाता है या कुछ ही मिनटों, घंटों में माँ से अलग करके उनका हिस्से का दूध आपको बेचने के लिए कई बार क्रूरता की हद भी लांग दी जाती है। उनकी माँ का दूध निकालने और बच्चा एक भी बूंद दूध न पी सके इसके लिए बच्चे को, उनसे दूर करके उसका सिर काटकर एक लकड़ी के खिलौने पर लगाकर माँ को दिखाया जाता है, जिसे देखकर वह दूध दे। लेकिन माँ तो माँ होती है, माँ को उसका एहसास हो ही जाता है। फिर जो माँ दूध देती है वह गुण युक्त नहीं बल्कि कई बीमारियों का कारण और बद्दुआएं देने वाला हो जाता है। अपने यहाँ कहा भी गया है कि जैसा खाइए अन्न, वैसा हो ये मन। इतना ही नहीं, यह तो केवल शुरुआत मात्र है। भैंस या गाय को गर्भवती बनाने के लिए कृत्रिम तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है, जिसका सक्सेस रेट मात्र 2% होता है। माँ के बच्चे दानी में कोई दिक्कत बनती है या वह शुरू से बांझ होती है तो तुरंत उसे कसाई को बेचा जाता है। अब धन नहीं तो उसके लिए अन्य नहीं। ऐसा अधिकतर पशुपालकों का मानना है। वैसे तो औसतन एक गाय की उम्र लगभग 15 से 20 वर्ष की होती है, परंतु अपने स्वार्थ में उसे केवल 4.5 से 6 साल तक ही पाला जाता है। जब तक वह दूध देती है उसे डेरी फार्म में रखा जाता है। जब उसका दूध पूरी तरह निचोड़ लिया जाता है। तब उसे भी कसाइयों के हवाले कर दिया जाता है। उसे कृत्रिम रूप से पहली बार लगभग 25 महीने में ही प्रेग्नेंट किया जाता है। दूध की वॉल्यूम बढ़ाने के लिए ब्रीडिंग की जाती है, रोज़ इन्हें इंजेक्शन लगाकर उनका दूध निकालते हैं। जो कई डायबिटिक और कैंसर जैसी अनंत बीमारियों का कारण बनता है। सरकार द्वारा कई ऐसे टीके भी बैन किए गए हैं। क्योंकि इतिहास में ऐसे भी केस बने हैं जिसमें गिद्धों की संख्या लगातार गिरने का बड़ा कारण यही लगाए गए टीके निकलकर सामने आया। जो भी बाहर घूमने वाली गाय भैंस जिन्हें दूध निकाल कर 4 से 6 साल बाद बाहर छोड़ दिया जाता था वह जब मरती थी उन्हें गिद्ध खाते थे तो लगभग 10 में से केवल एक गिद्ध की जिंदा बच पाता था। वह केमिकल पशुओं के पेट से होते हुए गिद्धों के शरीर में जाता था और उन्हें भी मौत की नींद सुला देता था। यह बाहर घूमती गाय क्यों बाहर छोड़ दी जाती थी? कसाइयों को नहीं दी जाती थी। इसका भी कारण आपको बाद में बताएंगे। जो कि राजीव दीक्षित जी से जुड़ा हुआ है। 



इस तरह से कृत्रिम प्रक्रिया को इस्तेमाल करके जब किसी भी पशु को गर्भवती किया जाता है तो उसके लिए झोला छाप डॉक्टर जो केवल दो हफ्ते की बेसिक ट्रेनिंग लेकर अच्छा।जाते हैं, उन्हें यह काम सौंपा जाता है। इसका सीधा भुगतान माँ को तो करना ही होता है, साथ ही बेल या भैंसे को भी भारी कीमत चुकानी पड़ती है।उसे बिजली की झटके देकर हफ्ते में चार बार उसका सीमन निकाला जाता है, जिससे वह बेहोश हो जाता है। यह इतना तेज झटका जब उसे लगता है तो वह चलने की हालत में बिल्कुल नहीं रहता। और कुछ दिनों बाद जब बैल इस काम का नहीं रहता, उसके साथ भी वही हश्र होता है। उसे भी अंततः कसाइयों के हवाले कर दिया जाता है। इसके और भी तरीके झोला छाप डॉ अपनाते हैं, जो सीमन निकालने में वे प्रयोग में लेते हैं। भले ही इसके लिए पशु को कितनी ही दर्द से गुजरना पड़े। इन सबकी नर्क की जिंदगी अभी शुरू हुई है। इनकी कटाई जीन राज्यों में बैन है जो कि राजीव दीक्षित जी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में किए गए केस के बाद बैन किए गए थे,वहाँ से 4 पशुओं की कैपेसिटी वाले ट्रकों में 100 से 150 पशुओं को भरकर एक राज्य से दूसरे राज्य के बॉर्डर को पार करवातें हुए, बंगाल एवं कर्नाटक जहाँ इनकी कटाई को मंजूरी राज्य सरकार द्वारा दी गयी है, वहाँ ले जाया जाता है। जिससे पशु तस्करी का नाम देते हैं। दुख इस बात का भी है जब राजीव दीक्षित जी ने पशु की हत्या पर बैन लगवाया, गोहत्या पर बैन लगाया, तब राज्य सरकारों को सुप्रीम कोर्ट की ओर से यह जिम्मेदारी दी गई थी एवं नागरिको को भी यह जिम्मेदारी दी गई थी कि वह गोहत्या को रुकवाए। यह इकलौता कानून आमजन को सुनिश्चित करवाता है कि वह गोहत्या को खुद से रोक सकता है। लेकिन राज्य सरकार ने केवल गोहत्या बैन तो लगाया परंतु उनकी देखभाल के लिए सुनिश्चित गोशालाएं एवं पशुचारा की व्यवस्था नहीं की गयी। यह सरकार की एक बड़ी नाकामयाबी है। जिसका आज भी हमें खेद है।


 इन पशुओं को ट्रक में एक राज्य से दूसरे राज्य दूसरे से तीसरे राज्य जब भेजा जाता है तो ये है बिना कुछ खाये पिए 5-6 दिन ट्रक के अंदर एक दूसरे के उपर पड़े रहते हैं जिससे यह कटाई क्षेत्र में जब पहुँच जाते हैं तब इनके शरीर से चलने लायक जान नहीं बचती। कई बार गर्भवती पशुओं को भी जब अंदर ढकेल दिया जाता है तब उनका बच्चा अंदर ही मर जाता है। जब पशु पहुँचता है, वो खून से लथपथ होकर बाहर निकलता है। हम उस समय उस मां के भीतर चल रही दुख का अनुमान भी नहीं लगा सकते। 


वहाँ के लोगों द्वारा दिखाए गए डर से उन्हे एक लोहे की बनी लेन में चलने के लिए मजबूर किया जाता है। जब ये सामने हो रही अपने जैसी और पशुओं की हत्या को देखते हैं तो इनका दिल बैठ जाता है। इनमें चलने का साहस नहीं रहता तब उनके पैर में एक लोहे की बेल या रस्सी से एक पैर को बांधकर झटके से ऊपर उल्टा लटका दिया जाता है। जिससे कई बार देखा गया कि उसकी टांग की हड्डी भी टूट जाती है परंतु फिर भी वह उल्टा लटकाकर उन पर इसके बाद सो डिग्री से ऊपर के तापमान में रखी गई बाप छोड़ते हैं ताकि दर्द से सूजन आने के कारण इनका शरीर फूल जाए। डेढ़ से 2 घंटे के बाद उन्हें नीचे उतारा जाता है। जब वे जिंदा ही रहती है तभी उन्हें उतारकर उनको एक तेजधार चाकू से उनकी चमड़ी को उनसे अलग किया जाता है एवं गले पे कट लगाकर उन्हें तड़पते हुए मरने के लिए छोड़ दिया जाता है, क्योंकि तब उनका हार्ट चल रहा होता है, पंप कर रहा होता है तब वह खून को धीरे धीरे बाहर निकाल देते हैं। और वह खून दवाई बनाने के लिए अलग अलग देशों में एक्सपोर्ट कर देते हैं। ज़ो उनका चमड़ा उतारा गया था। उससे जूते, चप्पल एवं अन्य संसाधन बनते हैं। उनके सिंग से बटन बनाए जाते हैं। मॉस अलग अलग देशों में एक्सपोर्ट कर दिया जाता है। एवं उनकी हड्डियों को दवाई के लिए या शो पीस बनाने के लिए अलग अलग देशों में एक्सपोर्ट कर दिया जाता है। 


डेरी फार्मिंग अमूल ने विदेश से कॉपी करके भारत में शुरू की थी, जिसे सफेद क्रांति का नाम दिया जाता है। उसी क्रांति के नतीजे है कि भारत जैसे अहिंसावादी देश में, जहाँ अंग्रेजों को भी यह सब अशुद्ध चीजे खाने के लिए छिपकर काम करना होता था, वह आज खुलेआम हो रहा है। अब सरकार से पूछने वाला कोई नहीं है। क्या केवल आजादी इंसानों के लिए है? इस देश में आज भी पशु गुलाम है। ये वही देश है जहाँ मंगल पांडेय ने गाय की चर्बी से बने कारतूस इस्तेमाल करने से विरोध में आजादी की लड़ाई की शुरुआत की थी और अंत में फांसी लटका दिए गए। आज ऊंची दरों पर भुगतान करके हम उसी से बने जूते चप्पल दवाईयां और न जाने क्या क्या इस्तेमाल करते हैं। इस समस्या का हल क्या हो? इस पाप से कैसे बचें और प्रायश्चित कैसे करें? जो दूध हमने अपनी माँ को असहनीय कष्ट देकर पाया है उसका प्रायश्चित कैसे हो? इसका एक स्वाभाविक जवाब हो सकता है कि सबसे पहले हम डेरी प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करना बंद करें। दूसरा, जिसे चाहिए दूध वह गोपालन करके जिम्मेदारी लें। अन्यथा पैसे से पाप कमाना बंद करें। इसके कारण हो रही अनंत बीमारियों से भुगतान आज इंसान कर ही रहा है। मेहनत से पुण्य व अच्छी क्वालिटी का दूध पीएं। 

आतंकवादियों के लिए देश में घुसपैठ करने के लिए एवं अन्य किसी अपराधों के लिए कसाई कारखाने एक अहम जगह है एवं यहां काम करने वालों के हृदय में संवेदनशीलता खत्म हो रही है। जो समाज में बढ़ रही आतंकवादी एवं अपराधी गतिविधियों में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप में कहीं ना कहीं जिम्मेदार है। इनके लिए अपराध करना खाना खाने बराबर हो जाता है और वह दिन दूर नहीं, बल्कि आज भी ऐसी घटनाए देखने को मिलती है जब यह अत्याचार जानवरों पर करने वाले अब इंसानों तक भी पहुंच गए हैं। तभी हमें मानव तस्करी जैसी भयानक एवं डरा देने वाली घटनाएं सुनने में आती है और प्रतिदिन जो अपराधी घटनाएं भारत में बढ़ रही हैं वह चाहे अपहरण हो या इज्जत से खिलवाड़ या मार काट। यह सभी घटनाएं कहीं ना कहीं ऐसे ही लोगों द्वारा प्रेरित रहती हैं। जिन्हें भ्रष्ट नेताओं का भी सपोर्ट रहता है। वह इन्हें सपोर्ट करके देश को बेचने का भी काम करते हैं। जिसमें आज करोड़ों की कमाई होने के कारण जो भी इसके खिलाफ आवाज उठाता है उसकी आवाज दबाने के लिए सभी देशविरोधी ताकते एक हो जाती हैं। इसीलिए इस मुद्दे की जिम्मेदारी केवल और केवल भारत के लोग ही उठा सकते हैं।


 अब गौ माता के जीवन गणित की बात कर लेते हैं। राजीव दीक्षित जी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में प्रमाणित: काटने पर मांस, चर्म, खून, हड्डी आदि का कुल अर्निंग सात ह़जार रुपए होता है। वहीं इसकी जगह अगर हम गोपालना करते हैं तब? अगर हम एक बार दूध से होने वाली कमाई को छोड़ भी दें तब भी एक गाय औसतन 10 किलो गोबर 1 दिन में देती है। जिसमें एक किलो से 33 किलो खाद बनाई जा सकती है, जो कि राजीव दीक्षित जी के गांव में उनके माता पिता भी यहीं काम करते थे। एक किलो खाद की कुल कीमत लगभग लगभग सात से ₹10 प्रति किलो है। आप हिसाब लगाएं तो लगभग ₹3300 प्रतिदिन एक गाय के गोबर से हम कमा सकते हैं। और लगभग एक गाय की 15 से 20 की औसत उम्र रहती है, इस दौरान एक गाय से हम 12,50,00,000 की कमाई कर सकते। एक गौमाता दिन में एक गैलन दूध यानी लगभग 3.25 किलो दूध हमें देती हैं, जिनमें से अगर हम आधा दूध उसके बच्चों को पिलाते है बाकी बचा हुआ दूध हम अपने घर परिवार के लिए लेते है। तो वह अलग बेनिफिट देता है। जिसकी कीमत का अनुमान लगाना संभव नहीं। और क्यों की गौमाता अपने बच्चे का दूध का भाग हमें पिलाती है इसलिए तो हम उन्हें माँ कहते हैं। जो न जाने कितने ही गुणों से युक्त दूध हमें जब देती है, जब वह खुश रहती। इसके अलावा लगभग ढ़ाई लीटर गोमूत्र। गाय प्रतिदिन हमें देती है, एक लीटर की इंटरनेशनल मार्केट में कीमत लगभग ₹250 से ₹500 प्रति लीटर है और इसे दवाई और पेस्टिसाइड के रूप में भी यूज़ किया जाता है। घर में भी एंटी इन्सेक्ट के तौर पर इस लिक्विड को यूज़ करते हैं। इससे भी हम एक गौमाता की लाइफ में 33,00,000 की अर्निंग कर सकते। एक्स्क्लूडिंग प्यूरीफाई कॉस्ट। गाय को पालने का खर्चा कितना आता है? क्योंकि हम गाय को अकेले पालकर खुश नहीं रख सकते। उसके साथ उसकी फैमिली का होना जरूरी है। इसीलिए उसका एक बच्चा एक वयस्क बेल और एक गौमाता कम से कम शुरू में अपनी फैमिली में लेकर आए। जिसमें से प्रति पशु हमें 10 ह़जार रुपए एक महीने का कॉस्ट आता है। इसमें उसका खाना पीना दवाई एवं अन्य आवश्यक मिनरल्स युक्त खाना उसे हम दे सकते। 


 ये अगर उच्च कोटि की हैं जैसे देसी गाय, गीर, गाय आदि तो यह प्रॉफिट बढ़ जाता है। यह राजीव दीक्षित जी के सुप्रीम कोर्ट में लड़े केस के आधार पर न्यूनतम बताया गया है। 


जिससे साथ ही गोबर की नई तकनीक जो डॉक्टर शिव दर्शन मलिक, (रोहतक, शीला बाईपास) गो क्रेट की ईंट बना रहे हैं उनसे प्रेरित है। उनकी अपनी वेबसाइट। है। उनका कॉन्टैक्ट नंबर है 9812054982. 


 Vegan बनना इंस्टेंट सोल्यूशंस हो सकता है पर असल में तो गाय पालें और दूध पिएं या स्वदेशी प्रॉडक्ट्स को अपनाएं। सीमेंट आदि से बड़ी मात्रा में पहाड़ की कटाई, जमीन बंजर, भूकंप, बाढ़ जैसी आपदाएं पृथ्वी के असंतुलन के बढ़ने से आती है या आने वाली है। इसे रोकने के लिए गोक्रेट की ईंट अपने रियल एस्टेट में लगाए, घर बनाने में लगाए। इन गोबर मिट्टी से बनी ईंटों को अपनाकर फिर से एक बार गोमाता को अर्थव्यवस्था को मजबूत अंग बनाएं। धन्यवाद। 



21/08/2023

Written by Tushar





 Resource of information

 Maa Ka Doodh (माँ का दूध) Full Movie | Hindi | 4K 

https://youtu.be/XhTOLeevtQw

 Rajiv Dixit VS Muslim Butuchers Debate in Supreme Court Against Cow slaughtering.. 

https://youtu.be/i7xaTCfA7js

 Vedic Plaster and Paint, Gobar Cement | New Construction Technic || By CivilGuruji https://youtu.be/-TMRJkgqVkM

prakartik paint ecofriendly

https://youtu.be/J83Y9jgp--Q

gomutar use IIT Bombay PHD holder research 

https://youtu.be/MohkOIbGqy8?si=Q0zvpbUIHIKQpicW

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